श्रीलंका में जारी सियासी संकट के सभी अनसुलझे सवालों के जवाब

श्रीलंका में इस वक़्त जो कुछ हो रहा है वो 'हाउस ऑफ़ कार्ड्स', 'गेम ऑफ़ थ्रोन्स' और शेक्सपियर को डरावने रोमन नाटकों के बीच कहीं फ़िट होता है.

इसमें एक ऐसा शख़्स है जिसमें अपने नेता को धोखा दिया और बाद में उसे ही वापस सत्ता में ले आया.
इसमें एक हत्या का कथित प्लॉट है.
इसमें दो ऐसे लोग हैं उस सफ़ेद बंगले पर अपना दावा ठोंक रहे हैं जो श्रीलंका की राजनीतिक ताक़त का प्रतीक है.
इस ख़ूबसूरत देश को किस तरह का संवैधानिक संकट जकड़े हुए है? इस सवाल के कई जवाब हैं, जो कुछ ऐसे हैं:

संकट कैसे पैदा हुआ?
इसका जवाब अपने आप में काफ़ी उलझा हुआ हुआ है क्योंकि इस कहानी में कई ट्विस्ट और टर्न हैं.

पिछले हफ़्ते श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना ने प्रधानमंत्री रानिल विक्रमासिंघे को पद से हटाकर पूरे देश को चौंका दिया. सिरिसेना ने कैबिनेट और संसद भी भंग कर दी.

इससे भी ज़्यादा नाटकीयता तब सामने आई जब सिरिसेना ने महिंदा राजपक्षे को प्रधानमंत्री के पद पर नियुक्त कर दिया, उसी राजपक्षे को जिसे उन्होंने साल 2015 के राष्ट्रपति चुनाव में हराया था. 

महिंदा राजपक्षे ने 2005-2015 के अहम दौर में श्रीलंका का नेतृत्व किया. उन्होंने अपने शासनकाल में श्रीलंका में दशकों से चले आ रहे गृहयुद्ध का विवादित अंत होते हुए भी देखा. उनके परिवार और करीबियों पर भ्रष्टाचार, युद्ध अपराध और देश को चीन के अरबों डॉलर के कर्ज़ में धकेलने के आरोप लगे.

राजपक्षे के परिवार ने इस सारे आरोपों से इनकार किया. आज भी उनका परिवार श्रीलंका के लोगों में लोकप्रिय है, ख़ासकर श्रीलंका के ग्रामीण इलाकों में. लेकिन संवाददाताओं की मानें तो अब भारत, यूरोपीय संघ और अमरीका राजपक्षे की वापसी से ख़ुश नहीं है.

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अब सवाल ये है कि सिरिसेना के इस यू-टर्न पर इतनी हैरानी क्यों? इसका जवाब पाने के लिए आपको 2015 के चुनाव में वापस जाना होगा. उस वक़्त सिरिसेना पर राजपक्षे को धोखा देने का आरोप लगा था क्योंकि एक ही पार्टी से ताल्लुक रखने के बावजूद सिरिसेना ने राजपक्षे को हराने के लिए विक्रमासिंघे से हाथ मिला लिया था.

अब जक सिरिसेना और विक्रमासिंघे के रिश्ते में दरार आ चुकी है, वो अपने पुराने साथी राजपक्षे के ओर लौट आए हैं

री तरह से नहीं. क्योंकि प्रधानमंत्री पद से हटाए गए विक्रमासिंघे ने 'टेंपल ट्री' यानी प्रधानमंत्री का आधिकारिक आवास छोड़ने से इनकार कर दिया है.

उनका कहना है कि सिरिसेना ने जो किया वो असंवैधानिक है और वो अब भी प्रधानमंत्री हैं. विक्रमासिंघे चाहते हैं कि संसद का कामकाज शुरू हो ताकि सांसद इस मसले पर वोट कर सकें. लेकिन सिरिसेना ऐसा होने नहीं दे रहे हैं.

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जानकारों का कहना है कि सिरिसेना ऐसा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि राजपक्षे को प्रधानमंत्री के तौर पर स्थापित करने के लिए ज़रूरी बहुमत उनके पास नहीं है.

दूसरी तरफ़ सिरिसेना और राजपक्षे का गठबंधन विक्रमासिंघे के वफ़ादार मंत्रियों को अपनी तरफ़ करने की कोशिश भी कर रहा है. कुछ का आरोप है कि उन्हें रिश्वत का प्रस्ताव भी दिया जा रहा है. हालांकि राजपक्षे की पार्टी के सांसदों ने इससे इनकार किया है.

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